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संस्कृत साहित्य में योग: एक दार्शनिक अध्ययन
डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, कमलाकर सिंह
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सारांश:
सभी दार्शनिक परंपराओं और धार्मिक संप्रदायों ने आत्म-साक्षात्कार के लिए योगाभ्यास को अनिवार्य माना गया है। वेदों तथा अन्य धार्मिक परंपराओं ने भी योग की उपयोगिता को स्वीकार किया है। योग शब्द का प्रायः अर्थ संयोग या मिलन बताया जाता है। यह इस तथ्य का द्योतक है कि व्यक्ति और ब्रह्मांड एक ही हैं, जैसे वे सार्वभौमिक स्तर पर एक हैं। योग शब्द संस्कृत धातु युज् से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना या एक करना। यह भी कहा जा सकता है कि योग पुनर्मिलन है। उपनिषदों में कहा गया है, जो एक था, वही अनेक हो गया। योग एक व्यापक शब्द है, और पतंजलि के सूत्र राजयोग का मुख्य ग्रंथ हैं। योग केवल ध्यान या प्राणायाम तक सीमित नहीं है; यह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उपयोगी है। महर्षि पतंजलि ने मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक और शैक्षिक दृष्टिकोण से योगसूत्रों को विस्तार देने का प्रयास किया, और ऋषि वशिष्ठ ने योग वशिष्ठ की रचना की।
आज मनुष्य यह मानता है कि वैज्ञानिक उन्नति ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है, लेकिन दर्शन और आध्यात्मिकता भी महत्वपूर्ण हैं। जीवन के उचित विकास के लिए इन दोनों के बीच सामंजस्य आवश्यक है। यह शोध इस भ्रांति को दूर करने का प्रयास करता है और स्पष्ट करता है कि प्राचीन भारतीय योग दर्शन मानसिक शांति और सकारात्मक विकास प्रदान कर सकता है। बदलते हुए समाज में यह समझना आवश्यक है कि वर्तमान शिक्षा के मूल्यों में परिवर्तन लाने के लिए योग दर्शन की शिक्षाओं को अपनाया जाना चाहिए। वैदिक काल के प्रारंभ में ऋग्वेद की रचना प्राचीन ऋषियों द्वारा की गई, जिन्होंने अपनी साधना-पद्धतियों, तप या योग के माध्यम से सत्य का साक्षात्कार किया था। उन्हें अतिन्द्रिय ज्ञान की दृष्टि प्राप्त थी, और इसी अनुभूति के द्वारा उन्होंने इस लोक तथा परलोक के जीवन के स्वरूप को समझा।
How to Cite:
[1] डॉ. कीर्ति कुमार त्रिपाठी, कमलाकर सिंह, “संस्कृत साहित्य में योग: एक दार्शनिक अध्ययन,” International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology (IARJSET), DOI: 10.17148/IARJSET.2026.13731
